कविता उत्साह जगाने के लिए लिखी गयी है....
‘माना हार हुई है जग में,
टूट गये हैं सारे सपने,
हिय आहत है, आघातों से,
माना छूटे सारे अपने।
रार ठनी है नियति से,
झंझावात विचारों का,
मन विचलित है, प्रतिद्वंदी भी,
स्वाँग भरे आचारों का ।
है एक धनुर्धर हम में-तुम में
आभूषित है जो गाण्डीव से,
उठो, जगो, अब चक्षु खोलो,
कर्म करो, पर शब्द ना बोलो।
प्रत्यंचा खींचो दृढ़ होकर,
शर इस पर रखो
आत्म-मान का,
बनो धनंजय निज जीवन के,
लक्ष्य साध भेदन कर दो अब
अपयश और अपमान का।
सुनो पुकार रहा है तुमको
जो संसार तुम्हारा है
जिसमें तुम हो, बस तुम ही हो,
ख़ुशियों ने पैर पसारा है।
दीप जलाओ नवल स्वप्न के
मन के तम का नाश करो
चलो उठो अब बहुत हो गया
हो दृढ़निश्चय, हुंकार भरो।
हो कलाकार, कौशल-पारंगत
क्यूँ डरते हो बाधाओं से
लो समेट सारी ऊर्ज़ा-तप
संग्राम करो कुंठाओं से।
‘विजयी-भव’ आशीष मिलेगा
जो कर्म-युद्ध में आओगे
रणछोड़ चले जाओगे जो
कैसे सम्मान बचाओगे
कैसे सम्मान बचाओगे ।
अर्चना शुक्ला की लेखनी से
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