Saturday, 31 December 2022

 




विधा- चौपाई

विषय- नया परिवेश (कुछ पंक्तियाँ) 


एक बालिका मिलने आई, 

सम्बोधित कर वह मुस्काई। 

बोली मुझे बात करनी है, 

एक शिकायत भी करनी है। 


मैंने उसको पास बुलाया, 

बड़े प्यार से हाथ मिलाया। 

मेरी बात सुनो, वह बोली, 

संग लाई चिट्ठी तब खोली। 


मैं परिसर में अभी नई हूँ ,

सब हिस्से में नहीं गई हूँ। 

मेरी कोई सखी नहीं है, 

फिर भी मन तो दुखी नहीं है। 


पहले दिन जब आप मिली थी,

मन में मेरे कली खिली थी। 

आप नहीं क्यों मिलने आती, 

मेरी सखी कभी बन जाती। 


मुझे किताबें कम हैं भाती,

भाषा इसकी समझ न आती। 

गुरुजन कहते पीछे हूँ मैं, 

तर्कशक्ति में नीचे हूँ मैं। 


माँ कहती है मैं उड़ सकती ,

जो चाहूँ मैं सब कर सकती। 

किसकी बात सही मैं मानूँ ,

कैसे खुद को मैं पहचानूँ। 


मुझको कोई राह दिखाएं, 

इस गुत्थी को अब सुलझाएं। 

चिंता अब तो यही सताए,  

बचपन मेरा बीत न जाए। 


मैंने उसको शांत कराया, 

झट से उसको गले लगाया। 

बच्ची की हर बात सही थी, 

उसकी चीखें निकल रही थी। 


विकल हो रहा था मन मेरा,

इस तम का है कहाँ सवेरा ।

किसको इसका दोषी बोलूँ ,

किस-किस की आँखें मैं खोलूँ। 


प्रतिदिन नए छात्र हैं आते, 

मुश्किल से खुद को समझाते। 

सभी नहीं यह सब कह पाते, 

न ही मन की व्यथा बताते।। 


निर्णय मैंने एक लिया है, 

खुद ने खुद को वचन दिया है। 

इस बगिया को मैं सींचूँगी,

पुष्प नहीं मुरझाने दूँगी।  


✍️ अर्चना शुक्ला

प्रयागराज, उत्तर प्रदेश  

 



Saturday, 27 February 2021

विषय- जिजीविषा

 


कविता उत्साह जगाने के लिए लिखी गयी है....


 ‘माना हार हुई है जग में,

टूट गये हैं सारे सपने,

हिय आहत है, आघातों से,

माना छूटे सारे अपने।


रार ठनी है नियति से,

झंझावात विचारों का,

मन विचलित है, प्रतिद्वंदी भी,

स्वाँग भरे आचारों का ।

 

है एक धनुर्धर हम में-तुम में

आभूषित है जो गाण्डीव से,

उठो, जगो, अब चक्षु खोलो,

कर्म करो, पर शब्द ना बोलो।


प्रत्यंचा खींचो दृढ़ होकर,

शर इस पर रखो 

आत्म-मान का,

बनो धनंजय निज जीवन के,

लक्ष्य साध भेदन कर दो अब

अपयश और अपमान का।


सुनो पुकार रहा है तुमको

जो संसार तुम्हारा है

जिसमें तुम हो, बस तुम ही हो,

ख़ुशियों ने पैर पसारा है।


दीप जलाओ नवल स्वप्न के 

मन के तम का नाश करो

चलो उठो अब बहुत हो गया

हो दृढ़निश्चय, हुंकार भरो।


हो कलाकार, कौशल-पारंगत

क्यूँ डरते हो बाधाओं से

लो समेट सारी ऊर्ज़ा-तप

संग्राम करो कुंठाओं से।


‘विजयी-भव’ आशीष मिलेगा

जो कर्म-युद्ध में आओगे

रणछोड़ चले जाओगे जो

कैसे सम्मान बचाओगे

कैसे सम्मान बचाओगे ।


अर्चना शुक्ला की लेखनी से  


Thursday, 7 May 2015

"काश अग़र ऐसा होता"

काश अग़र ऐसा होता ,
काश अग़र वैसा होता ,
काश कोई बंदिश ना होती ,
पूरी हर ख़्वाहिश होती .......

काश कोई दर्पण ऐसा होता
जिसमें दिल का रूप हो दिखता ,
हम-तुम होते खड़े सामने,
कुछ भी ना कहना पड़ता। …

काश कभी ग़र ऐसा होता ,
शब्दकोष में अपशब्द ना होते ,
ना ही कोई प्रयोग में लाता,
न कभी किसी का दिल दुखता।

काश कोई शक्ति ऐसी होती,
हवा प्रेम की ही बस बहती,
ईर्ष्या -द्वेष की जग़ह ना होती,
बस खुशियाँ ही खुशियाँ होती।

काश जहाँ कुछ ऐसा होता,
सब कुछ सुगम- सुन्दर होता,
हम -तुम सब साथ में होते,
ना कोई पीड़ा ना ग़म होता।

काश यहाँ उजले कपड़ों में,
दिल मैले से ना होते,
सोच तेरी दूषित ना होती,
ना  ही मेरा दम घुटता।

काश जहाँ में लोगों के,
चेहरों पर चेहरे ना होते,
सुन्दर निश्छल मन होता,
हम-तुम सब कितने खुश होते।

काश प्रतिस्पर्धा की सीढ़ी का
आधार योग्यता ही होती
हर कोई यहाँ सफल होता,
अरमान नहीं रौंदे जाते।

काश मेरा सपना सच होता,
काश ये ख्वाहिश पूरी होती,
काश  मैं जादूगर  होती ,
तो दुनिया सचमुच ऐसी होती। ……


(अर्चना शुक्ला)
 

Tuesday, 5 May 2015

" जो न पाया, उसकी चाहत में.... । "


                                          " जो न पाया, उसकी चाहत में.... । "

ज़िन्दगी  के हर पड़ाव पर,
हर एक मोड़ पर
कुछ ना पाने की
 कसक रह ही जाती है........
कुछ हाथ से छूटने की
तड़प रह ही जाती है...........
जो पाया वो कम ना था
पर जो छूटा उसका ग़म था.……।
जश्न भी मना ना पाये
उन लम्हों को जी ना पाये…
जो आँचल में आये थे तारे
 वो कुछ कम ना थे प्यारे ....
पर कुछ बिखरे तारों के
ग़म को शायद भुला  ना पाये ……
सच.... जो खोया उसकी चुभन
दिल में पीड़ा दे ही जाती है………।
ज़िन्दगी  के हर पड़ाव पर,
हर एक मोड़ पर
कुछ ना पाने की
 कसक रह ही जाती है........
जो वश में नहीं है अपने यारों
उसकी चादर में लिपटी दुनिया
विश्वास नहीं अपने कर्मों पर
भाग्य के बल पर चलती दुनिया …
भाग्य भरोसे चलते - चलते
मन की कुंठा बढ़ ही जाती है………
ज़िन्दगी  के हर पड़ाव पर,
हर एक मोड़ पर
कुछ ना पाने की
 कसक रह ही जाती है........